आपने भीतर जो ’विश’ (असत्) का ’वास’ (महत्ता/आवश्यक्ता) और ’विश्व’ (संसार) की ’आस’ (आशा) है, वो हमारा प्रभु पर ’विश्वास’ नहीं होने देता।
संतोंकी बातें इतनी अलौकिक हैं कि हम उनका विवेचन भी नहीं कर सकते, फिर अनुभवकी तो बात ही अलग है !
संतोंका संग किया जाए